Tuesday, 2 January 2018

 सब्र हर बार अख्तियार किया
हम से होता नहीं हज़ार किया 

आदतन तुमने कर दिए वादे  
आदतन हम ने ऐतबार किया 

हमने अक्सर तुम्हारी राहों में 
रुक के अपना ही इंतज़ार किया 

फिर न मांगेंगे ज़िन्दगी या रब 
ये गुनाह हमने इक बार किया 


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पनाह मिल जाए रूह को जिसका 
हाथ छूकर 

उसी हथेली पे घर बना लो। ... 

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उसे आईलाइनर पसंद था , मुझे काजल 
वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफ़ी पे मारती थी और मैं अदरक की चाय पे 
उसे नाईट क्लब पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़के 
शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था 
लेखक बोरिंग लगते थे उसे पर ,
मुझे मिनटों देखा कराती थी, जब मैं लिखता
वो न्यूयोर्क के टाइम्स स्क्वेअर , इस्ताम्बुल के ग्रैंड बाजार में शॉपिंग के सपने देखती थी
मैं असम  के चाय के बाग में खोना चाहता था
मसूरी के लाल टिब्बे में बैठकर सूरज डूबता देखना चाहता था
उसकी बातों में  शहर थे और  मेरा तो पूरा शहर वो
 न मैंने उसे  बदलना चाहा, न उसने मुझे
अच्छा चला था इसी तरह सब
एक अरसा हुआ
दोनों के रिश्ते आगे बढे
कुछ दिन पहले उसके साथ ही रहनेवाली एक दोस्त से पता चला। ... अब वो शांत  हैं
लिखने लगी हैं, मसूरी भी घूम आयी , लाल टिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रही
और मैं। ...
मैं भी अब अक्सर कॉफ़ी पी लेता हूँ , किसी महँगी जगह बैठकर। 

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