सब्र हर बार अख्तियार किया
हम से होता नहीं हज़ार किया
आदतन तुमने कर दिए वादे
आदतन हम ने ऐतबार किया
हमने अक्सर तुम्हारी राहों में
रुक के अपना ही इंतज़ार किया
फिर न मांगेंगे ज़िन्दगी या रब
ये गुनाह हमने इक बार किया
-------------------------------------------
पनाह मिल जाए रूह को जिसका
हाथ छूकर
उसी हथेली पे घर बना लो। ...
----------------------------------------------
उसे आईलाइनर पसंद था , मुझे काजल
वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफ़ी पे मारती थी और मैं अदरक की चाय पे
उसे नाईट क्लब पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़के
शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था
लेखक बोरिंग लगते थे उसे पर ,
मुझे मिनटों देखा कराती थी, जब मैं लिखता
वो न्यूयोर्क के टाइम्स स्क्वेअर , इस्ताम्बुल के ग्रैंड बाजार में शॉपिंग के सपने देखती थी
मैं असम के चाय के बाग में खोना चाहता था
मसूरी के लाल टिब्बे में बैठकर सूरज डूबता देखना चाहता था
उसकी बातों में शहर थे और मेरा तो पूरा शहर वो
न मैंने उसे बदलना चाहा, न उसने मुझे
अच्छा चला था इसी तरह सब
एक अरसा हुआ
दोनों के रिश्ते आगे बढे
कुछ दिन पहले उसके साथ ही रहनेवाली एक दोस्त से पता चला। ... अब वो शांत हैं
लिखने लगी हैं, मसूरी भी घूम आयी , लाल टिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रही
और मैं। ...
मैं भी अब अक्सर कॉफ़ी पी लेता हूँ , किसी महँगी जगह बैठकर।