Tuesday, 2 January 2018

न्योछावर  प्रेम ये , जीवन ये उन आँखों के पानी पर
किसी शबरी के जूठे  बेर वाली इक कहानी पर
न्योछावर उस कनु पर , वो कनु जो ईश है मेरा
कनु के प्रेम मैं पागल किसी मीरा दीवानी पर


आपने वो शबरी और राम की कहानी सुनी है न ? और कनु मेरे लिए प्रेम का प्रतीक है...  कनु कभी कृष्ण है ,, कभी राधा है ,,, कभी मीरा है... कभी ये तीनो ,, और कभी कुछ नहीं,,, कभी सिर्फ एक अधूरापन,, एक प्यास,,, और कभी कनु उस प्यास की तृप्ति है.....
काश हो ऐसा की हम दोनों बन जाये सरगम और साज़
काश हो ऐसा मेरे सुर की बन जाओ कभी तुम आवाज़
काश हो ऐसा मैं हूँ दिया इक और दिए की बाती तुम
और जब तम ढक लेता मुझको दीपशिखा बन जाती तुम-                                           तम -- अँधेरा
मन के पनघट पर जिस दिन लेकर गागर आओ तुम
फिसल के इसमें गिर जाओ और कभी निकल न पाओ तुम
क्या है भरोसा इस जीवन में उदय-अस्त का ए प्रियतम
काश हो ऐसा उषा बनकर जीवन में आ जाओ तुम
तुम्हे कभी जब चोट लगे तो  आह मेरे दिल से निकले
काश हो ऐसा समय पिघल कर अपने प्रेम में आ पिघले
काश हो ऐसा हम मिल जाये ऐसे जैसे नदी में नीर
काश हो ऐसा पा लू तुमको जैसे खुदा को पाए फ़कीर
गला घोंट दे काल की रस्सी सांस की डोरी टूटे जब
तेरी नज़र का साया हो बस तेरी बांह में सर हो तब
सपना हो चाहे ये  सारा कितना प्यारा है हमदम
काश हो ऐसा हाथ हो मेरा हाथ में तेरे मरते दम
चेहरे पे चेहरे कितने , शक्लो पे शकले कितनी
इतने नकाब हम सब  , पहने है क्यों खुदाया
कितनी हसी है झूठी  , हसते है हम सभी जो
सच्चे है कितने आंसू, हमने जिन्हें छुपाया
 सब्र हर बार अख्तियार किया
हम से होता नहीं हज़ार किया 

आदतन तुमने कर दिए वादे  
आदतन हम ने ऐतबार किया 

हमने अक्सर तुम्हारी राहों में 
रुक के अपना ही इंतज़ार किया 

फिर न मांगेंगे ज़िन्दगी या रब 
ये गुनाह हमने इक बार किया 


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पनाह मिल जाए रूह को जिसका 
हाथ छूकर 

उसी हथेली पे घर बना लो। ... 

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उसे आईलाइनर पसंद था , मुझे काजल 
वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफ़ी पे मारती थी और मैं अदरक की चाय पे 
उसे नाईट क्लब पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़के 
शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था 
लेखक बोरिंग लगते थे उसे पर ,
मुझे मिनटों देखा कराती थी, जब मैं लिखता
वो न्यूयोर्क के टाइम्स स्क्वेअर , इस्ताम्बुल के ग्रैंड बाजार में शॉपिंग के सपने देखती थी
मैं असम  के चाय के बाग में खोना चाहता था
मसूरी के लाल टिब्बे में बैठकर सूरज डूबता देखना चाहता था
उसकी बातों में  शहर थे और  मेरा तो पूरा शहर वो
 न मैंने उसे  बदलना चाहा, न उसने मुझे
अच्छा चला था इसी तरह सब
एक अरसा हुआ
दोनों के रिश्ते आगे बढे
कुछ दिन पहले उसके साथ ही रहनेवाली एक दोस्त से पता चला। ... अब वो शांत  हैं
लिखने लगी हैं, मसूरी भी घूम आयी , लाल टिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रही
और मैं। ...
मैं भी अब अक्सर कॉफ़ी पी लेता हूँ , किसी महँगी जगह बैठकर। 

GULZAR JI

कुरान  हाथों में लेके नाबीना एक नमाज़ी लबों पे रखता था
दोनों आँखों से चूमता था 
झुकाके पेशानी  यूँ अकीदत से छू रहा था 
जो आयते पढ़  नहीं सका 
उन के लम्स महसूस कर रहा हो 

मैं हैराँ हैराँ गुज़र गया था 
मैं हैरां हैराँ ठहर गया हूँ 

तुम्हारे हाथों को चुम कर 
छू के अपनी आखोंसे आज मैंने 
जो आयते  पढ़ नहीं सका 
उन के लम्स महसूस कर लिए हैं 

गुलज़ार