प्रमथ्यु गाथा
प्रमथ्यु एक युनानी पुराण-पुरुष है
जो सृष्टि के आरंभ में पहली बार
स्वर्ग से, घुपितर के महलों से मनुष्यों के त्राण के लिए
अग्नि हर लाया था ।
दण्ड स्वरूप घुपितर ने उसे एक शिला से बंधवा दिया था
और एक गिद्ध उसके ह्र्दयपिण्ड को खाते रहने के लिए तैनात कर दिया गया था।
प्रस्तुत रचना में प्रमथ्यु, घुपितर, अग्नि, गिद्ध सभी अपना-अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हैं ।
[1][प्रमथ्यु]
जकड़े हुए हैं ये मेरे हाथ
लौह श्रृखलाओं से
जड़ी हुई जो कीलों से
इस आदिम चट्टान से,
टूटी हुई है पसलियाँ
और मन का घाव
अन्दर का सारा दर्द
नंगा अनावृत है
घुपितर की आज्ञा से
नरभक्षी बूढ़ा गिद्ध
मेरे कंधों पर बैठ
दिन-भर नोचा करता है मेरा ह्र्दयपिण्ड
और मैं बेबस हूँ
बन्दी हूँ ।
मैंने, क्यंकि मैंने ही
प्रथम बार साहस किया
घुपितर के महलों से अग्नि छीन लाने का
अन्धी घाटी में भयभीत भेड के समान
पृथ्वी यह
अँधियारे में थी सहमी खड़ी
मैने, हाँ मैंने ही प्रथम बार साहस किया
[2] [ घुपितर ]
साहस नहीं था;
मैं ने जो नक्शा बनया था
मानव अस्तित्व का-
उसमें थी दासता,
विनय थी, कायरता थी
भय था, आतंक था
अंधेरा था
यह जो
इस व्यक्ति ने
अँधेरे को देकर चुनौती
दुस्साहस किया
यह मेरी सत्ता का प्रथम अनादर था
मैं ने इसे दंड़ दिया
वर्जित थी ज्योति
और गर्हित था स्वातन्त्र्य
साहस उत्पन्न ही नहीं किया था मैं ने तब
इसकी यह लायी हुई आग
अगर साहस बन फ़ैल गयी होती मनुष्यों में
फ़िर वे उठाते सिर
फ़िर फ़िर वे उठाते सिर्…
[3] [ जन-साधरण ]
मूरख नहीं है जी !
हम क्यों उठाते सिर
हम क्यों ये सब साहस करते व्यर्थ
अग्नि जिसे लाना था ले आया !
अग्नि नहीं थी जब
तब हमने नहीं कहा
कि जाओ अग्नि ले आओ तुम
और अग्नि जब आयी
हम ने नहीं कहा कि अग्नि नहीं लेंगे हम
यह जो हम अब भी खड़े हैं
प्रमथ्यु के आस-पास-
इसलिए नही कि हम कुछ
उसके अनुगामी हैं,
हम हैं तमाशबीन
देख रहे हैं कैसे जकड़ा हुआ है शिलाओं से
कैसे वह कन्धे पर बैठा हुआ गिद्ध
नोच-नोच खाता है उसका ह्र्दयपिण्ड
और रात ढ़लते-ढ़लते कैसे
सारा घाव फ़िर से पुर जाता है
ताकि गिद्ध फ़िर नोचे
यह है करिश्मा और
हम सब करिश्मों के प्यासे हैं !
चाहता अगर तो हममें से हर एक व्यक्ति
अपने ही साहस से प्रमथ्यु हो सकता था
लेकिन हम डरते थे,
ज्योति चाहते थे
पर द्ण्ड भोगने से हम डरते थे !
हम सब करिश्मों के प्यासे हैं
कोई भी करिश्मा कर दिखलाये
हम खुद क्यूं लें कोई भी निर्णय
हम खुद क्यूं भोगें कोई भी दण्ड ?
[4] [ अग्नि ]
वे थे सब स्वार्थी
विलासी थे, कायर थे
जिनके महलों में मैं बन्दी थी
मुक्त किया मुझको प्रमथ्यु ने
उसने कहा
तुम हो ज्योति
तुम्ही जीवन हो
माथे से अपने लगाकर प्रमथ्यु ने
फ़ेंक दिया फ़िर मुझको इन कायरों के बीच
मुझसे ये
सुबह-शाम चुल्हा सुलगाएंगे
सोना गलाएंगे
और ज़रा-सा मौका पाते ही
अपने पड़ोसी का घर फ़ूकेंगे ।
मुझको क्यों मुक्त किया
मुझको क्यों माथे से लगाकर
फ़िर फ़ेंक दिया इन कायरों के बीच
[5] [ प्रमथ्यु ]
मुझको मालूम नहीं था कुछ भी
डूबा था सब कुछ अँधियारे में
अँधियारे में मैं भी डूबा था
अग्नि किसे कहते हैं
इसका आभास भी नहीं था मुझे
गिद्ध यह बैठा है जो मेरे कन्धों पर
ऊपर उड़ते-उड़ते पहली बार इसने देखी थी झलक अग्नि की !
साहस था मेरा
किन्तु घुपितर के महलों की गुप्त राह
इसने बतायी मुझे-
गुरुजन है!
सच है यह
मेरे कन्धों पर बैठ
नोच-नोच खाता है यह मेरा ह्र्दयपिण्ड
फ़िर भी मेरा मस्तक नत है
होठों को भींचे नि:शब्द सह रहा हूँ मैं
क्योंकि यह बूढ़ा गिद्ध गुणी है, ज्ञाता है ।
मस्तक नत है मेरा
इसलिए नहीं कि हूँ पराजित मैं
इसलिए कि जिनके हित अग्नि जीत लाया हूँ
उनमें नहीं है साहस या संवेदना
जिनमें नहीं है साहस प्रमथ्यु बनने का
उसको बिना पीड़ा के मिल जाने वाली अग्नि
माँजती नहीं है
और पशु ही बनाती है !
अग्नि मिलने पर भी
वे सब पशु के पशु हैं
जिनको नृशंस स्वाद आता है
मेरी इस मर्मान्तक पीड़ा में !
देता है जो बूढा गिद्ध
मेरे ही कन्धो पर बैठकर
[6] [ गिद्ध ]
कटु मत हो
सुनो वत्स !
शोभा नहीं देती कटुता प्रमथ्यु को
सच है यह
मैं ने ही प्रेरित किया था तुम्हे देव-अग्नि लाने को
क्योंकि धरा पर नीचे गहरा अँधियारा था
जीवन-भर मैंने आकाश में
निरर्थक चक्कर काटे
ऊँचे पर्वत, उबड़-खाबड़ घाटीवाली
धरती पर कैसे उतरता मैं ?
नीचे अँधियारा था
अब मैं हूँ बूढ़ा
और मेरे थके हैं पंख
कब तक आकाश मे विहार करूँ
सिवाय तुम्हारे इन सबल पुष्ट कन्धों के और कहाँ बैठूँ मैं ?
कटु मत हो
आहत है मेरा अहम
मेरे थे पंख और मैं ने देखी थी अग्नि
मैं भी ला सकता था
किन्तु एक थोड़े-से साहस के बगैर
मैं अग्नि जीत लाने से वंचित रहा
तुम मेरे प्रियजन
मेरा यह आहत अहम
अगर तुम्हारे मांसपिण्ड से बुझाता है
अपनी भूख
तो तुम क्या इतना भी नहीं सहोगे मेरे लिए
सुनो वत्स!
मुझको यदि मानते हो गुरुजन
तो बात सुनो
सहते चलो सब कुछ
माथे पर शिकन नहीं लाना कभी
मन में घृणा नहीं लाना कभी
घृणा वो जहर है
जो नसों में प्रवाहित
रक्त को दूषित करता है
और वह रक्त
वह तुम्हारा रक्त
अन्ततोगत्वा मुझको ही तो पीना है !
[7] [ प्रमथ्यु ]
पियो
जी भरकर पियो,
गुरुजन हो
मेरी शिराओं में रक्त बह रहा है तुम्हारा ही
जी भर पियो !
कटु मैं नहीं हूँ
घृणा किस से करूँगा मै
ये जो जन हैं, साधरण जन हैं
उनमें से एक-एक के अन्दर
मुर्छित प्रमथ्यु कहीं बन्दी है !
अवसर जिसे मिला नहीं साहस कर पाने का
कोई तो ऐसा दिन होगा
जब मेरे ये पीड़ा-सिक्त स्वर
उसके मन को बेध मुर्छित प्रमथ्यु को जगायेंगे !
उस दिन
हाँ, उस दिन
अकेला मैं रहूंगा नहीं
सबके ह्र्दय में मैं जागूँगा
मैं--प्रमथ्यु:
कटु मैं नहीं हूँ
घृणा किससे करूँगा मैं
…।समाप्त्।
प्रमथ्यु गाथा पहले भी पढ़ी थी। धर्मवीर भारती की यह कविता अज्ञेय की असाध्य वीणा और मुक्तिबोध की अँधेरे मे से ज्यादा सशक्त और देशज है। मैने भाई सुरेश ऋतुपर्ण की प्रेरणा से आज इसे पढ़ा है। मुझे लगता है कि आजके प्रमथ्यु नरेन्द्र मोदी ही हैं।
ReplyDeleteप्रमाथ्यु की इससे बड़ी बेइज्जती मैने आजतक नहीं पढ़ी क्यों गली दे रहे है आप प्रमाथ्यु को?
Deleteशर्म आनी चाहिए आपको। मुक्तिबोध और अज्ञेय रो रहे होंगे।